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किसान की आय का प्रश्न
September 17, 2019 • Damodar Singh

यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थी किसानों से बातचीत करते हुए एक बार फिर यह रेखांकित किया कि उनकी सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन उन्हें यह आभास होना चाहिए कि यह एक कठिन लक्ष्य है और किसान अच्छे दिन के लिए वर्ष 2022 तक इंतजार करते नहीं रह सकते। इसमें दोराय नहीं कि बीते चार सालों में खेती और किसानों की हालत सुधारने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और उनके कुछ अनुकूल नतीजे भी सामने आए हैं, लेकिन कृषि को मुनाफे का सौदा बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह इस बात का सतत आकलन करती रहे कि उसके उपायों से कृषि उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि हो पा रही है या नहीं। कायदे से अब तक किसानों को यह नजर आने लगना चाहिए था कि 2022 तक वास्तव में उनकी आय दोगुनी होने जा रही है। फिलहाल तो वे बेचैन ही अधिक दिख रहे हैं। इस मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि रह-रहकर देश के विभिन्न हिस्सों के किसानों की समस्याएं सतह पर आ रही हैं। इसी तरह किसान आंदोलन की खबरें भी आती रहती हैं। मोदी सरकार खेती की लागत को कम करने, उपज की समुचित कीमत देने, फसलों को नुकसान से बचाने के साथ किसानों को आय के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराने पर उचित ही जोर दे रही है. लेकिन बात तब बनेगी जब इनसे संबंधित योजनाएं सही तरह से और समय पर क्रियान्वित हों। निःसंदेह यह तब संभव होगा जब राज्य सरकारें भी किसानों की हालत सुधारने और खासकर कृषि उत्पादकता बढ़ाने को अपने एजेंडे पर लें। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कृषि और किसान की बेहतरी की सारी जिम्मेदारी केवल केंद्रीय सत्ता की है।निःसंदेह खाद्यान्न की पैदावार बढ़ना उल्लेखनीय है, लेकिन किसानों की समस्या यह है कि उन्हें कई बार अपनी अच्छी उपज के बेहतर दाम नहीं मिल पाते। 

यह ठीक नहीं कि कमरतोड़ मेहनत के बाद किसान अपनी उपज का उचित मूल्य हासिल न कर सकें। खेती कहीं अधिक श्रम की मांग करती है, लेकिन उसके एवज में किसान को उतनी आय नहीं हो पाती कि वह अपना जीवन-यापन सही तरह कर सके। खेती का घाटे का सौदा बनना और फिर भी एक बड़ी आबादी का उस पर निर्भर होना ठीक नहीं। खेती को लाभकारी पेशा बनाने के उपायों के साथ ही सरकार को यह भी देखना होगा कि कृषि पर विशालकाय ग्रामीण आबादी की निर्भरता कैसे घटेइसी तरह उसे इसकी भी चिंता करनी होगी कि तमाम प्रयासों के बाद भी खेती मुख्यतः मानसून पर ही निर्भर क्यों है?

एक विडंबना यह भी है कि जहां सिंचाई परियोजनाएं अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, वहीं कृषि कार्यों में पानी का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। पर्याप्त सिंचाई परियोजनाओं के अभाव के साथ ही भू-जल का घटता स्तर कोई शुभ संकेत नहीं। हर खेत में पानी पहुंचाने के लिए सिंचाई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के साथ ही सरकार को यह भी देखना होगा कि पानी का उचित इस्तेमाल कैसे हो?